बरसात का मौसम ख़त्म होने के साथ किसान आलू की बुवाई की तैयारी में जुट जाते हैं। आलू की सभी मंडियों में अच्छी मांग रहती है। आलू नकदी की फसल भी है। अच्छी आमदनी के लिए आलू की उन्नत किस्मों को सोना लाभकारी होता है।

पाला सहन करने में सक्षम थेकुफरी सिंदूरी किस्म: कुफरी सिंदूरी भी आलू की एक उन्नत किस्म है, जो पाले को भी सहन कर सकती है. मैदानी और पहाड़ी इलाकों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। पहाड़ी इलाके के मुकाबले मैदानी इलाके में फसल जल्दी तैयार हो जाती है। यह किस्म 120 से 125 दिनों में तैयार होती है।

आलू की ज्यादा उपज देने वाली एक किस्म है किस्म है -कुफरी अलंकार । यह किस्म प्रति हेक्टेयर 200 से 250 क्विंटल तक उपज देती है। इस किस्म के आलू की फसल 70 दिनों में ही तैयार हो जाती है। ये किस्म उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में अच्छी पैदावार देती है।

उत्तर भारत में सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली किस्म है – कुफरी पुखराज किस्म। ये किस्म आलू की सबसे खास किस्म है, जो उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में सबसे कम अवधि में तैयार होती है. उत्तर भारत में इसकी खेती सबसे अधिक होती है। इस किस्म की खेती उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, झारखंड, छत्तीसगढ़, और उड़ीसा में किया जाता है. इस किस्म की अच्छी बात तो ये है कि यह वैरायटी बुवाई के 100 दिनों के अंदर ही तैयार हो जाती है।

आलू की चिप्स बनाने वालों की पहली पसंद है -कुफरी चिप्सोना किस्म । इस किस्म को चिप्स बनाने के लिए उपयुक्त माना जाता है। इस किस्म की खेती भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल में की जाती है। आलू के इस किस्म में किसान को प्रति हेक्टेयर में 300 से 350 कुंटल तक की पैदावार मिलती है।

कभी आलू की खेती पारंपरिक तरीकों से की जाती थी, जिससे फसलों में नुकसान देखने को मिलता था, लेकिन आज तमाम उन्नत तकनीकों और सही प्रबंधन के सहारे आलू का बंपर उत्पादन मिल रहा है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश और पंजाब के किसानों ने आलू उत्पादन में सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। सबसे ज्यादा आलू पैदा करने वाला सूबा उत्तर प्रदेश है।

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