खरीफ 2026 भारतीय कृषि और एग्रीबिजनेस के लिए एक बड़े जोखिम और अवसर दोनों का संकेत दे रहा है। जलवायु परिवर्तन, उर्वरक आपूर्ति संकट और मिट्टी की गिरती गुणवत्ता—ये तीनों कारक एक साथ प्रभाव डालने की स्थिति में हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार चुनौती केवल मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्पादन, लागत और किसानों की आय से जुड़ा व्यापक संकट बन सकता है।


जलवायु संकट: एल नीनो का बढ़ता खतरा

वैश्विक मौसम एजेंसी NOAA Climate Prediction Center के अनुसार, मई से जुलाई 2026 के बीच एल नीनो विकसित होने की संभावना 60% से अधिक है, जो साल के अंत तक जारी रह सकता है। भारत में India Meteorological Department और Skymet Weather के अनुमान बताते हैं कि मानसून की शुरुआत सामान्य रह सकती है, लेकिन अगस्त-सितंबर में बारिश असमान और कम हो सकती है।

यह वही समय होता है जब कपास, सोयाबीन, धान और गन्ने जैसी फसलें अपनी संवेदनशील अवस्था (reproductive stage) में होती हैं। ऐसे में हीट वेव और पानी की कमी से उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है।


मिट्टी की सेहत: छिपा हुआ बड़ा संकट

भारत की 60% से अधिक वर्षा आधारित खेती “ग्रीन वाटर” यानी मिट्टी में जमा नमी पर निर्भर करती है। लेकिन वर्षों से रासायनिक खेती के कारण मिट्टी की जल धारण क्षमता (Water Holding Capacity) 15–25% तक घट चुकी है।

इसका सीधा असर यह है कि फसलें सूखे के छोटे अंतराल (10–15 दिन) भी सहन नहीं कर पातीं। विशेषज्ञों के अनुसार, मिट्टी की संरचना सुधारने और जैविक गतिविधियों को बढ़ाने की दिशा में काम करना अब जरूरी हो गया है।


उर्वरक संकट: आपूर्ति और लागत दोनों पर दबाव

फरवरी 2026 में Strait of Hormuz में आए व्यवधान के कारण भारत की उर्वरक आपूर्ति प्रभावित हुई है। यूरिया की उपलब्धता पर दबाव है, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें लगभग दोगुनी हो चुकी हैं।

  • यूरिया की मांग: 18–19 मिलियन टन
  • शुरुआती स्टॉक: करीब 5.5 मिलियन टन
  • आयात कीमत: $400 से बढ़कर $950 प्रति टन

सरकार ने सब्सिडी बढ़ाकर कीमतें नियंत्रित रखी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर आपूर्ति अनिश्चित बनी हुई है। वहीं, गैर-सब्सिडी वाले उर्वरकों जैसे DAP और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कीमतों में 20–30% तक वृद्धि हो चुकी है।


NUE: उर्वरक उपयोग की दक्षता पर फोकस

भारत में नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (NUE) केवल 35% है, यानी 65% उर्वरक बेकार हो जाता है। विकसित देशों में यह आंकड़ा 50% से अधिक है।

इस स्थिति में जैविक उर्वरकों और नई तकनीकों का उपयोग लागत कम करने और उत्पादन बनाए रखने के लिए जरूरी हो गया है। नाइट्रोजन फिक्सिंग बैक्टीरिया और स्लो-रिलीज उर्वरक जैसे विकल्प अब तेजी से चर्चा में हैं।


फसल पर हीट स्ट्रेस का असर

एल नीनो के दौरान तापमान बढ़ने से फसलों में कई शारीरिक बदलाव होते हैं:

  • पत्तियों के छिद्र (stomata) बंद हो जाते हैं
  • प्रकाश संश्लेषण कम हो जाता है
  • फूल और फल झड़ने लगते हैं

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि 10 दिन की हीट वेव फूल आने के समय पड़ जाए तो उत्पादन 15–25% तक घट सकता है।


कीट प्रकोप: एक और बढ़ता खतरा

कमजोर और तनावग्रस्त फसलें कीटों के हमले के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। एल नीनो वर्षों में यह समस्या और बढ़ जाती है। ऐसे में किसानों को कीट प्रबंधन के लिए पहले से तैयारी करनी होगी।


चार चरणों की रणनीति जरूरी

खरीफ 2026 के जोखिम को देखते हुए विशेषज्ञ चार-स्तरीय रणनीति की सलाह दे रहे हैं:

  1. बुवाई से पहले: मिट्टी की गुणवत्ता सुधारना, जैविक उर्वरकों का उपयोग
  2. उर्वरक प्रबंधन: मौसम के अनुसार उर्वरक का उपयोग
  3. फसल सुरक्षा: सूखा और गर्मी के दौरान त्वरित उपाय
  4. मिड-सीजन प्रोटेक्शन: कीट और रोग से बचाव

निष्कर्ष

खरीफ 2026 केवल एक सामान्य कृषि सीजन नहीं, बल्कि एक “रिस्क मैनेजमेंट टेस्ट” है। जलवायु, लागत और संसाधनों की चुनौती के बीच वही किसान और एग्रीबिजनेस सफल होंगे जो समय रहते नई तकनीकों, जैविक समाधानों और स्मार्ट रणनीतियों को अपनाएंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि विज्ञान और सही समय पर हस्तक्षेप ही इस चुनौतीपूर्ण सीजन में उत्पादन और मुनाफे को सुरक्षित रख सकता है।