नई दिल्ली। भारतीय कृषि एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। दशकों तक खेती में अधिक उत्पादन के लिए रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और सिंचाई जैसे इनपुट बढ़ाने पर जोर दिया गया, लेकिन अब विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल अपनी सीमाओं तक पहुंच चुका है। आने वाले समय में कृषि का भविष्य “बायोलॉजिकल प्लेटफॉर्म” और प्राकृतिक जैविक प्रणालियों को समझकर खेती को नए सिरे से डिजाइन करने में छिपा है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार खेती केवल मशीनों और रसायनों से संचालित होने वाली प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह मिट्टी, सूक्ष्मजीवों और पौधों के बीच लाखों वर्षों में विकसित हुए जटिल जैविक तंत्र पर आधारित है। ऐसे में आधुनिक तकनीकों को भी प्रकृति की इसी जैविक संरचना के अनुरूप विकसित करना होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि 20वीं सदी की हरित क्रांति ने उत्पादन बढ़ाकर करोड़ों लोगों को खाद्य संकट से बचाया। उस दौर में अधिक उर्वरक, अधिक सिंचाई और रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग से कृषि उत्पादकता में बड़ी वृद्धि हुई। लेकिन अब यही मॉडल नई चुनौतियां पैदा कर रहा है।
आज देश में पोषक तत्व उपयोग दक्षता (Nutrient Use Efficiency – NUE) बेहद कमजोर स्थिति में है। भारत में एनपीके (नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश) का अनुपात 10:9:4 तक पहुंच गया है, जिसे विशेषज्ञ असंतुलित मानते हैं। इसके कारण मिट्टी की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है, उत्पादन वृद्धि रुकने लगी है और खेती की लागत लगातार बढ़ रही है।
इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी और सूखे जैसी समस्याएं पारंपरिक खेती मॉडल को और चुनौतीपूर्ण बना रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि किसान लगातार अधिक निवेश कर रहे हैं, लेकिन उत्पादन में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हो रही। यह संकेत है कि केवल इनपुट आधारित खेती का मॉडल अब टिकाऊ नहीं रह गया है।
अब कृषि क्षेत्र में जैविक तकनीकों और माइक्रोबायोम आधारित प्लेटफॉर्म पर तेजी से काम हो रहा है। इन तकनीकों का उद्देश्य मिट्टी की प्राकृतिक क्षमता को मजबूत करना, पोषक तत्वों के बेहतर उपयोग को बढ़ावा देना और पौधों को जलवायु संबंधी तनाव से लड़ने में सक्षम बनाना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की खेती केवल ज्यादा खाद और पानी देने पर आधारित नहीं होगी, बल्कि खेतों के जैविक तंत्र को समझकर उन्हें “री-प्रोग्राम” करने की दिशा में आगे बढ़ेगी।
जानकारों के अनुसार यदि भारत इस नई कृषि व्यवस्था को अपनाने में सफल होता है, तो इससे खेती की लागत कम होगी, मिट्टी की सेहत सुधरेगी और किसानों को जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से निपटने में मदद मिलेगी।