दिल्ली विधानसभा चुनाव तारीखों की घोषणा हो गई है। 5 फरवरी को वोटिंग होगी और 8 फरवरी को नतीजे आएंगे। इसका मतलब इस बार भी दिल्ली चुनाव एक चरण में पूरे होंगे। सभी 70 विधानसभा सीटों पर एक ही दिन वोटिंग होगी।
बुजुर्गों और दिव्यांदजनों के लिए इस बार भी घर बैठे वोटिंग की सुविधा होगी। 85 साल से ऊपर और दिव्यांगजनों को पोलिंग बूथ आने की जरूरत नहीं है। अगर ऐसे लोगे फिर भी वोटिंग करने आते हैं तो उनके लिए पोलिंग बूथ पर मौजूद वॉलंटियर्स उनकी मदद के लिए तैयार रहेंगे।
ईवीएम पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए चीफ इलेक्शन कमिश्नर ने कहा कि चुनाव से 7-8 दिन पहले ईवीएम तैयार की जाती है। हर दल को वोटर लिस्ट के बारे में जानकारी दी जाती है। एजेंट के सामने ईवीएम में चुनाव चिन्ह डाले जाते हैं। एजेंट के सामने ही ईवीएम सील की जाती है। कोर्ट ने भी कहा कि ईवीएम हैक नहीं की जा सकती। ईवीएम की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी है। राजीव कुमार ने आगे कहा कि ईवीएम में अवैध वोट डालने की संभावना नहीं है। ईवीएम फुलप्रूफ डिवाइस है। इसे मतदान के बाद सील कर दिया जाता है और इसमें वायरस नहीं जा सकता।
प्राप्त जानकारी अनुसार दिल्ली में विधानसभा की 70 सीटें हैं। इस चुनाव में मुख्य मुकाबला आम आदमी पार्टी, बीजेपी और कांग्रेस के बीच माना जा रहा है। फिलहाल दिल्ली में आप 2013 से सत्तारूढ़ है। दिल्ली में इस बार कुल 1 करोड़ 55 लाख 24 हजार 858 वोटर हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक, दिल्ली के चुनाव में इस बार कुल 1.55 करोड़ से ज्यादा मतदाता होंगे। इनमें पुरुष मतदाताओं की संख्या 83,49,645 जबकि महिला वोटर्स की संख्या 71,73,952 है. वहीं, थर्ड जेंडर की संख्या 1,261 है।
गौरतलब है कि दिल्ली में 2020 के विधानसभा चुनाव की तुलना में 7.26 लाख और 2024 के लोकसभा चुनाव की तुलना में 3.10 लाख वोटर्स बढ़ गए हैं। 2020 के चुनाव के वक्त दिल्ली में 1.47 करोड़ वोटर्स थे जबकि, पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव के समय दिल्ली में वोटर्स की संख्या 1.52 करोड़ से ज्यादा थी।
दिल्ली में राज्य विधानसभा का गठन पहली बार 1952 में किया गया था। तब दिल्ली में अंतरिम विधानसभा की व्यवस्था लागू की गई थी। उस वक्त दिल्ली के पहले सीएम के रूप में ब्रह्म प्रकाश यादव ने शपथ ली थी. उस समय उनकी उम्र महज 34 वर्ष थी। इसके बाद 1955 में कांग्रेस ने गुरमुख निहाल सिंह को दिल्ली का सीएम बनाया, जिनका कार्यकाल 1956 तक रहा। इसके बाद राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर सालभर बाद विधानसभा भंग हो गई। बाद में 1966 में दिल्ली मेट्रोपॉलिटन काउंसिल अस्तित्व में आ गया। इसके बाद 1993 में दिल्ली विधानसभा का गठन हुआ और पहली बार चुनाव हुए।
दिल्ली विधानसभा गठन के बाद 1993 में चुनाव हुए। इस चुनाव में बीजेपी ने प्रचंड जीत हासिल की और मदन लाल खुराना सीएम बने। सन् 1956 के बाद करीब 37 साल के लंबे अंतराल के बाद दिल्ली को सीएम मिला था। लेकिन बीजेपी की प्रचंड जीत के बाद भी दिल्ली में 5 साल के भीतर 3 सीएम बदले गए। पहले मदन लाल खुराना को घोटाले के आरोपों के बीच कुर्सी छोड़नी पड़ी. इसके बाद साहिब सिंह वर्मा को कमान मिली। लेकिन महंगाई के मुद्दे पर उनका भी विरोध हुआ और उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद सुषमा स्वराज को कमान मिली. जो दो महीने से भी कम समय के लिए दिल्ली की सीएम रहीं।
गौरतलब है कि साल 2013 के विधानसभा चुनाव में 70 सीटों वाली दिल्ली में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और उसे 32 सीटों पर जीत मिली थीं। बावजूद इसके बहुमत से फिसल जाने का कारण वह सत्ता से दूर ही रही। इस चुनाव में पहली बार चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी को 28 और कांग्रेस को 7 सीटें मिली थीं। इसके बाद AAP ने कांग्रेस का समर्थन लेकर दिल्ली में सरकार बनाई और पहली बार अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने।