पंजाब में पानी का संकट बढ़ा है। पंजाब में किसानों की पहली पसंद गेहूं और धान की खेती है। धान की बुवाई के बाद सिंचाई के लिए ज्यादा पानी की जरूरत होती है। इसके लिए पंजाब के अलावा हरियाणा में भी सीधी बिजाई के लिए और धान न बोकर खेत खाली रखने पर अनुदान राशि की मुनादी की गई है।

भू-जल संकट से पंजाब में भगवंत मान सरकार चिंतित है। इसी के मद्देनजर पंजाब सरकार ने एक जून से धान की बुवाई की अनुमति देने का फैसला किया है। जल्दी ही इसको लेकर अधिसूचना जारी होने की उम्मीद है। खेती के जानकार इस फैसले से भी चिंतित हैं। क्योंकि राज्य में भूजल का संकट तेजी से बढ़ रहा है और इसके लिए राज्य सरकार ने 2009 में एक कानून के माध्यम से भूजल के उपयोग को नियंत्रित करना शुरू कर दिया था।

कृषि विशेषज्ञ कहते हैं, ‘ किसान एक जून से धान की रोपाई कर सकते हैं जब तक कि उन्होंने 25-30 अप्रैल के दौरान नर्सरी में धान को उठाना शुरू नहीं किया, जो कानून की भावना का उल्लंघन करेगा।’ हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने तर्क दिया कि नर्सरी के पौधों की खेतों में रोपाई से अलग -अलग चरणों में कटाई हो सकती है, संभवतः जड़ों को जलने के प्रभाव को कम कर दिया गया निर्णय हो। दिल्ली के शीतकालीन वायु प्रदूषण, हाल के वर्षों में एक आवर्ती मुद्दा, आंशिक रूप से गेहूं की बुवाई के लिए खेतों को साफ करने के लिए धान के अवशेषों को जलाने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। पंजाब के कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुदियन ने कहा कि कानून को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है और यह एक अधिसूचना के माध्यम से किया जाएगा।

खेती – बाड़ी के जानकारों का मानना है कि पंजाब सरकार के जून में धान की बिजाई के इस फैसले से सूबे में फसल विविधता में मदद मिलेगी और किसान दूसरी फसलों की ओर रुख करेंगे।

प्रगतिशील किसानों का कहना है कि अगर सरकार भूजल के मुद्दे पर गंभीर है तो उसे वैकल्पिक फसलों पर ध्यान देना चाहिए। सूबे की सरकार को भी कम पानी की खपत वाली सभी फसलों पर एमएसपी देकर बढ़ावा देना चाहिए। सरकार को यह तय करना चाहिए कि सभी वैकल्पिक फसलों पर एमएसपी की गारंटी दी जाए ताकि किसान मुनाफाखोरों से बच सकें और भूजल भी बचें।