भारत में बासमती चावल के प्रोत्साहन और विकास के लिए एक अलग “बासमती प्रमोशन बोर्ड” बनाने की तैयारी तेज हो गई है। प्रस्ताव है कि इसे अन्य कमोडिटी बोर्ड्स की तर्ज पर वाणिज्य मंत्रालय के तहत स्थापित किया जाए। यह कदम बासमती को Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority के नियंत्रण से अलग कर एक समर्पित संस्थागत ढांचा देने की मांग के बाद उठाया जा रहा है।
इस संबंध में हाल ही में Bharatiya Kisan Sangh द्वारा आयोजित बैठक में विस्तृत चर्चा हुई। बैठक में All India Rice Exporters Association, Punjab Rice Millers Exporters Association, किसान प्रतिनिधि, विशेषज्ञ और उद्योग से जुड़े लोग शामिल हुए।
केंद्र सरकार को भेजी गई सिफारिश
सूत्रों के अनुसार, बैठक के बाद वाणिज्य मंत्री Piyush Goyal से अलग बासमती विकास बोर्ड बनाने की मांग की गई है। इसके अलावा प्रधानमंत्री कार्यालय को भी इस संबंध में अवगत कराया गया है।
यह मांग इसलिए उठ रही है क्योंकि बासमती चावल से होने वाले आर्थिक लाभ किसानों तक अपेक्षित रूप से नहीं पहुंच पा रहे हैं।
किसानों की आय पर दबाव
पिछले कुछ वर्षों में बासमती धान के दाम ₹2,500 से ₹3,700 प्रति क्विंटल के बीच रहे हैं, जबकि किसानों को ₹4,000 से अधिक कीमत की उम्मीद थी। महंगाई को ध्यान में रखते हुए वास्तविक आय में गिरावट आई है, जिससे बासमती की खेती अब गैर-बासमती फसलों के मुकाबले केवल थोड़ा ही अधिक लाभदायक रह गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि बासमती एक प्रीमियम और उच्च मूल्य वाला उत्पाद माना जाता है। इसके बावजूद इसकी प्रीमियम कीमत में गिरावट सीधे तौर पर किसानों की आय को प्रभावित कर रही है।
बढ़ती लागत और गुणवत्ता की चुनौती
खेती की लागत में भी तेजी से वृद्धि हुई है। उर्वरकों की कीमतें पिछले एक दशक में 2-3 गुना तक बढ़ी हैं, जबकि मजदूरी, ईंधन और कीटनाशकों की लागत भी बढ़ी है। इसके अलावा निर्यात के लिए सख्त गुणवत्ता मानकों और अवशेष (रेजिड्यू) नियमों के पालन से लागत और बढ़ गई है।
किसानों को बीज की गुणवत्ता को लेकर भी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कई बार मिश्रित या अविश्वसनीय बीज मिलने से उत्पाद निर्यात मानकों पर खरा नहीं उतर पाता, जिससे किसानों को अपेक्षित प्रीमियम नहीं मिल पाता।
APEDA की भूमिका पर सवाल
वर्तमान में बासमती निर्यात का प्रबंधन APEDA के पास है। निर्यातक संगठनों का कहना है कि APEDA कई अन्य उत्पादों को भी संभालता है, जिससे बासमती पर विशेष ध्यान नहीं दिया जा पाता।
हालांकि APEDA के अंतर्गत “बासमती एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन (BEDF)” कार्यरत है, लेकिन इसके प्रदर्शन को लेकर भी असंतोष जताया गया है।
बताया गया कि APEDA प्रति टन ₹70 की दर से रजिस्ट्रेशन-कम-अलॉटमेंट सर्टिफिकेट (RCAC) शुल्क लेता है, जिससे लगभग ₹45.5 करोड़ की राशि एकत्र होती है। इसमें से करीब 50% राशि APEDA अपनी सेवाओं के लिए रख लेता है, जबकि उसका कुल बजट ₹80 करोड़ है।
अलग बोर्ड से सुधार की उम्मीद
बैठक में यह भी कहा गया कि यदि अलग बासमती बोर्ड बनाया जाता है, तो वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सकता है और फंड का बेहतर उपयोग कर पाएगा। साथ ही, किसानों, निर्यातकों और उद्योग के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर बासमती क्षेत्र को नई दिशा दी जा सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि एक समर्पित बासमती बोर्ड बनने से न केवल किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा, बल्कि वैश्विक बाजार में भारतीय बासमती की साख भी मजबूत होगी।