उत्तर-पूर्वी बिहार को मखाने के लिए ही दुनिया भर में जाना जाता है.मखाने की सबसे ज्यादा पैदावार यहीं होती है| बिहार में 80 से 90 प्रतिशत मखाना उत्पादन होता है| मखाना के उत्पादन में 70 प्रतिशत हिस्सा मधुबनी और दरभंगा का है
यहां लगभग 120,000 टन बीज मखाने का उत्पादन होता है, जिससे 40,000 टन मखाने का लावा प्राप्त होता है|

मधुबनी और दरभंगा में मखाना की खेती को बढ़ावा देने और देश-विदेश में इसकी ब्रांडिंग और बिक्री बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री के निर्देश पर सरकार की ओर से कई स्तरों पर निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं| बिहार में मखाना के कुल उत्पादन में 2006 से लेकर अभीतक पांच गुना से| अधिक की वृद्धि हो चुकी है|मखाने का प्रयोग व्रत का फलाहार या नमकीन में किया जाता है| मखानों में कैल्शियम मैग्नीशियम प्रोटीन पाया जाता है| मखाने ग्लूटेन फ्री होते हैं| इसलिए जिनको ग्लूटेन से एलर्जी होती है. वह भी मखानों का सेवन कर सकते हैं|

मखाना को आम बोलचाल की भाषा में कमल का बीज भी बोलते हैं| यह ऐसी फसल है जिसे पानी में उगाया जाता है| बिहार के मधुबनी और दरभंगा में बड़े स्तर पर इसकी खेती की जाती है| बिहार सरकार द्वारा मखाना विकास योजना को दिसंबर 2019 में लांच किया गया था| इस योजना को बिहार के इन नौ जिलों में संचालित किया जा रहा है|

उत्तर-पूर्वी बिहार को मखाने के लिए ही दुनिया भर में जाना जाता है| उत्तर पूर्वी बिहार के दरभंगा, सहरसा, मधेपुरा, कटिहार, पूर्णिया, किशनगंज, मधुबनी, सुपौल और समस्तीपुर जिले मखाने के लिए ज्यादा जानें जाते हैं| मधुबनी जिले में ही 25 हजार से ज्यादा तालाब हैं, जहां मखाने की खेती होती हैं|

जिस मखाने को बजार में देखते है उसे उस रूप तक पहुंचाने में किसानों की काफी मेहनत लगती है|पहले मखाने का बीज तैयार किया जाता है| जिसे स्थानीय भाषा में गुणी भी कहते है. ये बिल्कुल कमलगट्टा ही है| बीज तैयार करने के बाद उसमें से मखाने को निकालना फाइनल प्रॉसेसिंग है| वहीं अगर कोई अपने यहां मखाने के बीज पैदा करता है| तो वह लागत की तुलना में डबल कमाई कर लेता है|किसान अक्सर मखाने की फसल मार्च और अप्रैल में लगाते है और अगस्त- सितंबर में पैदावार देती है|