सुप्रीम कोर्ट दागी राजनेताओं के संसद-विधानसभा में प्रवेश पर गंभीरता और सख्ती दिखा रहा है, पर दागियों का राजनीति में प्रवेश रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। दाग भी ऐसे, जो समाज के लिए अच्छे नहीं है। एक प्रत्याशी हेट स्पीच, एक गोरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग और एक आचार संहिता उल्लंघन का आरोपी है तो एक दहेज उत्पीड़न और एक आर्थिक अपराध का दागी है। ऐसे भी है, जिन पर आंदोलन के दौरान हत्या के प्रयास, बलवा व राजकार्य में बाधा के आरोप है।

लोकसभा चुनाव के पहले चरण में शामिल सीटों पर 11 प्रत्याशी ऐसे हैं, जो दामन दागदार होने के बावजूद मैदान में हैं। दागियों को रोकने के लिए नामांकन के शपथ पत्र में मुकदमों का खुलासा करने की अनिवार्यता सुप्रीम कोर्ट ने की। इस पर भी दागियों का लोकतंत्र के मंदिरों में प्रवेश नहीं रुका तो दलों को दागियों को टिकट देने की मजबूरी बताने के लिए विज्ञापन जारी करना अनिवार्य किया।

स्वयं दागियों को भी तीन बार अपने मुकदमों के बारे में विज्ञापन जारी करने की बाध्यता है। दागियों ने इसकी भी काट निकाल ली है। हिन्दी भाषा बहुल राजस्थान में ऐसे प्रत्याशी अंग्रेजी अखबारों में अपनी यह जानकारी देते हैं। इस सबके बावजूद निर्दलीय प्रत्याशियों के साथ ही बड़े राजनीतिक दल भी दागियों को चुनाव मैदान में उतारने से परहेज नहीं कर रहे हैं।

राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर चुनाव आयोग तैयार प्रारूप में दागियों को टिकट देने की मजबूरी का खुलासा करने के लिए विज्ञापन तो देते हैं, लेकिन अक्सर टिकट देने की मजबूरी बताने के लिए यही कहा जाता है कि प्रत्याशी जिताऊ है और आरोप सही नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दागियों के बारे में राजनीतिक दलों व प्रत्याशियों को आपराधिक मामलों को लेकर विज्ञापन देने की अनिवार्यता है, लेकिन विज्ञापन के नाम पर खानापूर्ति ही की जाती है। राजस्थान जैसे हिंदी भाषी राज्यों में भी विज्ञापन अंग्रेजी अखबारों या बढ़ा चढ़ाकर सर्कुलेशन बताने वाले अखबारों में दिए जाते हैं या चुनाव आयोग के प्रारूप के नाम पर तकनीकी भाषा में विज्ञापन दिए जाते हैं। टीवी पर दिखाए जाने वाले विज्ञापन में भी आपराधिक मामलों की सूची को ठीक से नहीं दिखाया जाता और आपराधिक मामले शब्द का इस्तेमाल करने के बजाय प्रारूप सी-2 या अन्य निर्धारित प्रारूप का जिक्र कर सूची दिखा दी जाती है।