यूक्रेन-रूस युद्ध, जो फरवरी 2022 में शुरू हुआ, ने न केवल मानवीय और आर्थिक तबाही मचाई है बल्कि यूक्रेन के कृषि भूमि, मिट्टी की गुणवत्ता, उपजाऊ शक्ति और कृषि प्रणाली पर भी गंभीर प्रभाव डाला है। यूक्रेन को दुनिया का “ब्रेडबास्केट” कहा जाता रहा है क्योंकि इसके 42.2 मिलियन हेक्टेयर भूमि का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा कृषि योग्य है और यह गेहूं, मक्का, सूरजमुखी और अन्य फसलों का प्रमुख विश्व उत्पादक रहा है। युद्ध के प्रभाव से यह स्थिति अब कमज़ोर पड़ चुकी है।
- कृषि भूमि में अवैध उपयोग और क्षति
युद्ध के परिणामस्वरूप लगभग 20 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि युद्ध-संबंधी सैन्य गतिविधियों, लैंडमाइंस और विस्फोटों के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हुई है। युद्धग्रस्त क्षेत्रों में उपकरणों के चलने, भारी मशीनरी और विस्फोटों से मिट्टी की संरचना, जैविक गतिविधि, और पोषक तत्व संतुलन बिगड़ गया है, जिससे जमीन की उपजाऊ क्षमता में गिरावट आई है। इसके अलावा, यूक्रेन की सबसे उपजाऊ चेरनोज़म मिट्टी (जो विश्व की सबसे उच्च गुणवत्ता वाली कृषि मिट्टियों में से एक है) भी युद्ध में प्रभावित हुई है।
- विस्फोट और भारी मशीनों से मिट्टी का विनाश
लगभग 400,000 से अधिक विस्फोट गड्ढों (क्रेटर) को उपग्रह निगरानी से पहचाना गया है। युद्ध से मिट्टी पर पड़ने वाले इन प्रभावों ने ना केवल उसके भौतिक गुणों को प्रभावित किया है बल्कि रासायनिक और जैविक गुणों को भी बदल दिया है। कई क्षेत्रों में भारी धातु जैसे सीसा, तांबा, जस्ता आदि सामान्य सीमा से कई गुना अधिक पाए गए हैं, जो मिट्टी की स्वास्थ्य और उपजाऊ क्षमता दोनों को प्रभावित कर रहे हैं।
- भूमि उपयोग में कमी, परित्यक्त खेत और कृषि क्रिया में बाधा
सैटेलाइट डेटा के आधार पर यह पाया गया है कि युद्ध के बाद यूक्रेन के विभिन्न हिस्सों में permanent unused farmland और unattended cropland (परित्यक्ता या बिना किसी निगरानी वाले खेत) की संख्या बढ़ी है। युद्ध की वजह से कई खेतों में खेती नहीं हो सकी है क्योंकि किसान या तो विस्थापित हो गए हैं या अजगरीय जोखिम के कारण जमीन तक पहुंच नहीं पा रहे हैं। विशेष रूप से डोनेट्स्क, क्रिमिया, खेरसन और ज़ापोरिज़्ज़िया क्षेत्रों में ये प्रभाव बहुत स्पष्ट हैं।
- मिट्टी में प्रदूषण और भारी धातु संचय
विस्फोटों, आग और विस्फोटक पदार्थों के फैलने के कारण मिट्टी में उत्सर्जित टॉक्सिक प्रदूषक (जैसे भारी धातु और रसायन) स्थानीय भूमिगत जल, खाद्य श्रृंखला, और कृषि उत्पादन को लंबे समय तक प्रभावित कर सकते हैं। यह समस्या बहुत गंभीर है क्योंकि कई ज़ोन में विस्फोटों के बाद रसायन मिट्टी में समा गए हैं और भविष्य की फसल गुणवत्ता के लिए खतरा उत्पन्न कर रहे हैं।
- लैंडमाइंस और कृषि भूमि की अनुपलब्धता
यूक्रेन अब दुनिया के सबसे ज़्यादा लैंडमाइंस वाले देशों में से एक बन चुका है। अनुमानित रूप से 2 मिलियन से अधिक लैंडमाइंस लगाई जा चुकी हैं, जिसने लगभग 23 प्रतिशत भूमि को कृषि उत्पादन के लिए असुरक्षित और अनुपयोगी बना दिया है। इन भूमि क्षेत्रों में खेती करना बेहद जोखिम भरा है और उन्हें साफ करने के लिए काफी समय और संसाधन चाहिए।
- कृषि उत्पादन में गिरावट और आर्थिक नुकसान
युद्ध के कारण यूक्रेन के कृषि सेक्टर को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। कियेव स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के आकलन के अनुसार, कृषि उत्पादन को लगभग $4.3 बिलियन तक का नुकसान हुआ है, जिसमें अधिकतर कृषि भूमि, मशीनरी और संसाधनों की क्षति शामिल है। खतरे के कारण कई क्षेत्रों में गेहूं, सूरजमुखी और अन्य प्रमुख फसलों की पैदावार गिर गई है।
- निर्यात और वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव
यूक्रेन वैश्विक गेहूं और अनाज का एक प्रमुख निर्यातक रहा है। युद्ध के कारण निर्यात अवरोधित हुआ और इसके परिणामस्वरूप वैश्विक खाद्य सुरक्षा को भी खतरा उत्पन्न हुआ है, क्योंकि दुनिया के कई हिस्सों को यूक्रेन से अनाज पर निर्भरता थी।
[16:29, 18/01/2026] Paras Amrohi Ji: ब्राज़ील का सोयाबीन जाल: बढ़ती ज़मीन, गिरती पैदावार और बढ़ता जलवायु जोखिम
कृषि आज वैश्विक जलवायु बहस के केंद्र में है। यह मानव जीवन के लिए अनिवार्य है, लेकिन साथ ही ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, भूमि-उपयोग परिवर्तन और वनों की कटाई का एक बड़ा कारण भी है। दूसरी ओर, यही क्षेत्र बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और सूखे के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील भी है। ये अंतर्विरोध हाल ही में ब्राज़ील के बेलेम में आयोजित जलवायु सम्मेलन में साफ नजर आए, जहां अमेज़न और बढ़ती वनों की कटाई चर्चा के केंद्र में रहे। सम्मेलन से ठीक पहले अमेज़न सोय मोराटोरियम (Amazon Soy Moratorium) को निलंबित किए जाने से वैश्विक स्तर पर चिंता और गहरी हो गई।
ब्राज़ील आज दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक और निर्यातक है। वर्ष 2023 तक देश का सोयाबीन उत्पादन लगभग 152 मिलियन टन तक पहुंच गया, जिसमें से 127.3 मिलियन टन का निर्यात हुआ। इससे ब्राज़ील की कुल निर्यात आय का करीब 16 प्रतिशत, यानी लगभग 53 अरब डॉलर प्राप्त हुए। लेकिन इस आर्थिक सफलता के पीछे छिपी संरचनात्मक कमजोरियां अब स्पष्ट होती जा रही हैं।
ज़्यादा ज़मीन, लेकिन कम सुरक्षा
2020 से 2022 के बीच ब्राज़ील में सोयाबीन की खेती का रकबा 37.2 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 41.2 मिलियन हेक्टेयर हो गया। इसी अवधि में सोयाबीन से जुड़ी वनों की कटाई 6.35 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 7.94 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई। इसके बावजूद, ला नीना से जुड़े सूखे के कारण उसी वर्ष ब्राज़ील को करीब 14 मिलियन टन सोयाबीन उत्पादन का नुकसान उठाना पड़ा। कई क्षेत्रों में पैदावार में आई गिरावट ने खेती के विस्तार से मिलने वाले लाभ को भी बेअसर कर दिया।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह एक गंभीर जोखिम का संकेत है। ब्राज़ील की लगभग 95 प्रतिशत खेती वर्षा पर निर्भर है। ऐसे में जब जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे अधिक बार और अधिक तीव्र हो रहे हैं, तो सोयाबीन जैसी फसल पर अत्यधिक निर्भरता देश की कृषि अर्थव्यवस्था को अस्थिर बना सकती है।
सोयाबीन की संरचनात्मक कमजोरी
सोयाबीन एक भूमि-गहन फसल है, जिसमें पैदावार बढ़ाने की गुंजाइश सीमित है—खासकर तब, जब जलवायु दबाव बढ़ रहा हो। उत्पादन बढ़ाने का मुख्य तरीका खेती का रकबा बढ़ाना बन गया है, जो पर्यावरणीय रूप से महंगा और आर्थिक रूप से जोखिम भरा है।
2008 से 2018 के बीच ब्राज़ील ने करीब 19 मिलियन हेक्टेयर चरागाह (पशुपालन भूमि) को कृषि भूमि में बदला, जिसमें अधिकांश हिस्सा सोयाबीन के लिए इस्तेमाल हुआ। वहीं, नए चरागाह बनाने के लिए 4.2 मिलियन हेक्टेयर प्राकृतिक अमेज़न वनस्पति को साफ किया गया। यानी सोयाबीन का विस्तार सीधे और परोक्ष रूप से वनों की कटाई को बढ़ावा दे रहा है।
अमेज़न से आगे सेराडो तक संकट
सोयाबीन से जुड़ा भूमि-उपयोग परिवर्तन केवल अमेज़न तक सीमित नहीं है। ब्राज़ील का दूसरा सबसे बड़ा जैव-क्षेत्र, उष्णकटिबंधीय सवाना जिसे स्थानीय रूप से सेराडो कहा जाता है, अब सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है। अकेले 2022 में सेराडो क्षेत्र में सोयाबीन के कारण 3.75 लाख हेक्टेयर भूमि का रूपांतरण हुआ—जो उस वर्ष अमेज़न में साफ किए गए क्षेत्र से तीन गुना अधिक था।
इस तेज़ बदलाव का असर जल चक्र पर पड़ रहा है। वर्षा के पैटर्न बिगड़ रहे हैं, नदियों और भूजल पर दबाव बढ़ रहा है और कृषि क्षेत्रों में जलवायु तनाव और गहरा होता जा रहा है।
वैश्विक स्तर पर भी असंतुलन
दुनिया भर में सोयाबीन लगभग 125 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में उगाई जाती है, जो वैश्विक तेल फसलों के कुल क्षेत्र का करीब 30 प्रतिशत है। इसके बावजूद यह केवल 28 प्रतिशत वनस्पति तेल की मांग ही पूरी करती है। इतना बड़ा भूमि उपयोग अपेक्षाकृत औसत पैदावार के साथ आता है। ऊपर से, सोयाबीन मिट्टी के कटाव को तेज करती है, ऊपरी मिट्टी में मौजूद कार्बन भंडार को घटाती है और सोयामील व बायोडीज़ल उत्पादन के जरिए भारी मात्रा में उत्सर्जन भी पैदा करती है।
इसके सामाजिक प्रभाव भी कम गंभीर नहीं हैं। सोयाबीन विस्तार ने स्थानीय समुदायों और आदिवासी आबादी को विस्थापित किया है, प्राकृतिक आवास नष्ट किए हैं और जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचाया है। कुछ क्षेत्रों में आर्थिक लाभ जरूर हुए हैं, लेकिन पर्यावरणीय और सामाजिक लागत अक्सर इन अल्पकालिक लाभों से कहीं अधिक है।
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