पंजाब में हालिया बाढ़ से हुई व्यापक तबाही के बीच विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य की मजबूती केवल राहत और पुनर्निर्माण से नहीं, बल्कि जलवायु-अनुकूल खेती पर रणनीतिक फोकस से सुनिश्चित होगी।
बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया (BISA) के प्रबंध निदेशक और अंतरराष्ट्रीय मक्का एवं गेहूं सुधार केंद्र (CIMMYT) के एशिया क्षेत्रीय निदेशक प्रसन्ना बोड्डुपल्ली ने बताया कि पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU), लुधियाना सहित विभिन्न संस्थानों के साथ मिलकर जलवायु-सहनशील मक्का की संकर किस्में विकसित करने पर काम हो रहा है।
उन्होंने कहा, “सिर्फ बेहतर बीज ही नहीं, बल्कि बेहतर प्रबंधन पद्धतियां भी जरूरी हैं। खेतों में जल निकासी प्रणाली को दुरुस्त करना होगा। प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़ में बेहतर बीज और बेहतर एग्रोनॉमिक मैनेजमेंट दोनों ही जरूरी हैं।”
बोड्डुपल्ली ने बताया कि CIMMYT ने ऐसे मक्का हाइब्रिड विकसित किए हैं जो सूखा, अधिक तापमान और जलभराव सहने में सक्षम हैं। अब तक लगभग 29 हाइब्रिड भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, भूटान और नेपाल सहित कई देशों में विकसित और जारी किए जा चुके हैं। भारत में ICAR, PAU और अन्य संस्थान इन किस्मों का सह-परीक्षण कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि जलभराव-सहनशील मक्का पर काम करीब 15 साल पहले शुरू हुआ था और अब पंजाब जैसे राज्यों में इन बीजों का परीक्षण और बड़े पैमाने पर रिलीज़ बेहद जरूरी है। “बीजों को स्थानीय परिस्थितियों में जांचना, आंकड़े जुटाना और नीति-निर्माताओं को समझाना होगा। इसके बाद ही बड़े पैमाने पर बीज उत्पादन और किसानों तक वितरण संभव है,” उन्होंने कहा।
बोड्डुपल्ली ने बताया कि वर्तमान में लगभग 3,000 टन प्रमाणित सूखा-सहनशील बीज भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और भूटान में वितरित किए जा रहे हैं। वहीं, पहली बार भूटान में सामुदायिक स्तर पर गर्मी-सहनशील मक्का हाइब्रिड का उत्पादन किया जा रहा है। हालांकि, उन्होंने जोर दिया कि अभी बहुत काम किया जाना बाकी है।