भारत की कृषि व्यवस्था बाहर से स्थिर और प्रगतिशील दिखाई देती है। उत्पादन और सरकारी खरीद के आंकड़े संतुलित हैं, करोड़ों किसानों को पीएम-किसान जैसी योजनाओं के तहत प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण मिल रहा है, और सिंचाई व एग्री-टेक से जुड़े कई पायलट प्रोजेक्ट सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। लेकिन इस सतही स्थिरता के नीचे कुछ गहरी संरचनात्मक दरारें मौजूद हैं, जिन्हें समय रहते नहीं भरा गया तो भविष्य की कृषि वृद्धि खतरे में पड़ सकती है।
विशेषज्ञों और सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, असंतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी की सेहत में गिरावट, भूजल संकट, बिखरे हुए कृषि बाजार और तकनीक तक असमान पहुंच जैसी समस्याएं भारतीय खेती की जड़ों को कमजोर कर रही हैं। यदि इन चुनौतियों को अवसर में बदला जाए, तो भारतीय कृषि न सिर्फ टिकाऊ बन सकती है, बल्कि किसानों की आय और आजीविका भी मजबूत हो सकती है।
उर्वरक सब्सिडी: आज की सुरक्षा, कल का पर्यावरणीय कर्ज
भारत की उर्वरक नीति दशकों से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से चलाई जा रही है। इसका परिणाम यह हुआ कि यूरिया जैसे नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों पर भारी सब्सिडी दी गई। वित्त वर्ष 2024-25 में उर्वरक सब्सिडी का बजट करीब 1.91 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। जुलाई 2025 तक ही 49,330 करोड़ रुपये की सब्सिडी जारी की जा चुकी है।
हालांकि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) प्रणाली से पारदर्शिता बढ़ी है, लेकिन दक्षता का सवाल अब भी बना हुआ है। यूरिया पर अधिक सब्सिडी और फॉस्फोरस-पोटाश पर तुलनात्मक रूप से कम समर्थन के कारण किसान असंतुलित उर्वरक उपयोग कर रहे हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता घट रही है और भूजल में नाइट्रेट प्रदूषण बढ़ रहा है।
नीतिगत सुझाव:
विशेषज्ञों का मानना है कि उर्वरक सब्सिडी को मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि संतुलित NPK और सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग को प्रोत्साहन मिले। इसके साथ ही बहु-पोषक तत्व मिश्रणों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सुलभ बनाया जाए और सब्सिडी बचत का एक हिस्सा राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य कोष में लगाया जाए।
भूजल संकट: मात्रा और गुणवत्ता दोनों खतरे में
भारत की कृषि आज भी भारी रूप से भूजल पर निर्भर है। ताजा आकलनों के अनुसार, कई क्षेत्रों में जलस्तर तेजी से गिर रहा है और उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से जल की गुणवत्ता भी खराब हो रही है। पंजाब में लगभग 78 प्रतिशत ब्लॉक ओवर-एक्सप्लॉइटेड श्रेणी में आ चुके हैं।
अटल भूजल योजना जैसी पहल से कुछ क्षेत्रों में सुधार दिखा है, लेकिन यह असमान है। उदाहरण के तौर पर, बेंगलुरु में इस वर्ष जलस्तर 0.5 से 1.2 मीटर तक सुधरा, फिर भी शहर ‘क्रिटिकल जोन’ में बना हुआ है।
नीतिगत सुझाव:
विशेषज्ञ स्थानीय स्तर पर भूजल बजटिंग, सामुदायिक रिचार्ज योजनाओं और सतही जल व उपचारित अपशिष्ट जल के संयुक्त उपयोग को बढ़ावा देने की सलाह देते हैं। साथ ही कृषि ऋण और बीमा को भूजल उपलब्धता से जोड़ने की आवश्यकता है।
मिट्टी: खेतों के नीचे छिपा संकट
मिट्टी भारतीय कृषि की रीढ़ है, लेकिन लंबे समय से रसायनों के अत्यधिक उपयोग और एकल फसल प्रणाली ने इसकी सेहत को नुकसान पहुंचाया है। 2025 के मृदा स्वास्थ्य मिशन के आंकड़ों के अनुसार, देश की 60 प्रतिशत से अधिक कृषि भूमि पोषक तत्वों की कमी से जूझ रही है।
पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जैविक कार्बन की मात्रा घटने से मिट्टी की जलधारण क्षमता और उत्पादकता पर असर पड़ रहा है।
नीतिगत सुझाव:
विशेषज्ञ क्षेत्र-विशेष मृदा प्रबंधन, फसल चक्र, हरित खाद, कम जुताई और जैविक संशोधनों को बढ़ावा देने पर जोर देते हैं। इसके लिए एक समर्पित राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य कोष और डिजिटल सॉयल मैपिंग की जरूरत बताई जा रही है।
भविष्य की राह
नीति विश्लेषकों का कहना है कि यदि उर्वरक, भूजल और मिट्टी से जुड़ी नीतियों को आपस में जोड़ा जाए और डेटा आधारित निर्णय लिए जाएं, तो भारतीय कृषि अधिक लचीली और टिकाऊ बन सकती है। आज की चुनौतियों को नजरअंदाज करने के बजाय, उन्हें सुधार के अवसर के रूप में देखना ही भविष्य की खाद्य सुरक्षा और किसान समृद्धि की कुंजी है।