भारत ने बायोटेक्नोलॉजी क्षेत्र में ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अपना पहला बायोफाउंड्री नेटवर्क (Biofoundry Network) लॉन्च किया है। इसे विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) और बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (BIRAC) ने संयुक्त रूप से शुरू किया। इस पहल का उद्देश्य देश को 2030 तक 300 अरब डॉलर की बायो-इकोनॉमी बनाने की दिशा में आगे बढ़ाना है।
यह नेटवर्क BioE3 पॉलिसी (Biotechnology for Environment, Economy and Employment) के तहत शुरू किया गया है और इसका मकसद एडवांस्ड बायो-मैन्युफैक्चरिंग को गति देना है। इसमें देशभर के 21 बायो-एनेबलर सुविधाओं को जोड़ा गया है, जो स्टार्टअप्स, लघु व मध्यम उद्योगों (SMEs), इंडस्ट्री और शैक्षणिक संस्थानों को साझा इन्फ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराएंगे।
इन केंद्रों में सूक्ष्मजीव आधारित बायो-फाउंड्री, स्मार्ट प्रोटीन, प्रॉबायोटिक्स, बायो-बेस्ड केमिकल्स, सेल और जीन थैरेपी, mRNA आधारित दवाइयाँ, समुद्री बायो-इनोवेशन और सतत बायोफ्यूल जैसी तकनीकों पर काम होगा। यह सभी सुविधाएं मिलकर भारत में नवाचार, व्यावसायीकरण और आत्मनिर्भरता को मजबूत करेंगी।
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा, “यह केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं, बल्कि एक रूपांतरकारी इकोसिस्टम है। यह रोजगार सृजित करेगा, हरित विकास को बढ़ावा देगा और भारत को वैश्विक बायो-इकोनॉमी लीडर के रूप में स्थापित करेगा। हम आत्मनिर्भर भारत और जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप 2047 तक मल्टी-ट्रिलियन डॉलर बायो-इकोनॉमी की नींव रख रहे हैं।”
डीबीटी सचिव और बीरैक अध्यक्ष राजेश एस गोखले ने कहा कि यह नेटवर्क भारत की वैज्ञानिक खोजों को बाज़ार तक तेजी से पहुंचाने में मदद करेगा। साझा इन्फ्रास्ट्रक्चर से संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ेगा और खोजें जल्द ही लैब से मार्केट तक पहुंच पाएंगी।
डीबीटी की वरिष्ठ सलाहकार अल्का शर्मा ने कहा कि बायोफाउंड्री और बायो-मैन्युफैक्चरिंग हब लागत घटाते हैं, नवाचार को गति देते हैं और खाद्य, ईंधन व स्वास्थ्य क्षेत्र में मजबूती लाते हैं। वहीं, बीरैक के प्रबंध निदेशक जितेंद्र कुमार ने कहा कि स्टार्टअप्स को स्केलिंग में आने वाली रुकावटें अब कम होंगी और यह नेटवर्क उन्हें वैश्विक साझेदारी और निर्यात के अवसर भी देगा।