नई दिल्ली। भारत मौसम विज्ञान विभाग के 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के पहले पूर्वानुमान ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। तीन साल में पहली बार “सामान्य से कम” बारिश की आशंका जताई गई है, साथ ही एल नीनो की स्थिति बनने के संकेत भी दिए गए हैं।
ऐसे में सवाल उठता है—जब देश की खेती, ग्रामीण मांग और खाद्य महंगाई अब भी मानसून पर निर्भर है, तो पानी बचाने वाली माइक्रो इरिगेशन तकनीकों (ड्रिप और स्प्रिंकलर) का बड़े पैमाने पर विस्तार क्यों नहीं हो पाया?
माइक्रो इरिगेशन: समाधान, लेकिन सीमित अपनापन
माइक्रो इरिगेशन तकनीकें—ड्रिप और स्प्रिंकलर—पानी के कुशल उपयोग, उर्वरक की बचत और सूखे के दौरान फसल को बचाने में मदद करती हैं।
- ड्रिप इरिगेशन: पौधों की जड़ों तक सीधे पानी पहुंचाता है
- स्प्रिंकलर: बारिश की तरह पानी का छिड़काव करता है
इसके बावजूद, इनका विस्तार असमान और धीमा रहा है।
सरकार के प्रयास, लेकिन सीमित असर
सरकार पिछले दो दशकों से माइक्रो इरिगेशन को बढ़ावा दे रही है। 2015-16 में शुरू की गई Per Drop More Crop (PDMC) योजना के तहत:
- छोटे किसानों को 55% तक सब्सिडी
- अन्य किसानों को 45% तक सहायता
मार्च 2025 तक करीब 96.97 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया है।
FY16 से दिसंबर 2024 तक राज्यों को ₹21,968 करोड़ से ज्यादा जारी किए गए।
इसके अलावा, NABARD के साथ माइक्रो इरिगेशन फंड भी बनाया गया, जिसके तहत ₹3,640 करोड़ वितरित किए जा चुके हैं।
राज्यों के बीच भारी असमानता
भारत में माइक्रो इरिगेशन का सबसे बड़ा विरोधाभास राज्यों के बीच अंतर है।
- पंजाब: 2015-16 से 2023-24 के बीच सिर्फ 15,173 हेक्टेयर (0.18%)
- गुजरात: इसी अवधि में 10.87 लाख हेक्टेयर (13.02%)
यह अंतर नीतियों और प्रोत्साहनों की दिशा को दिखाता है।
मुफ्त बिजली बना बड़ी बाधा
विशेषज्ञों के अनुसार, पंजाब और हरियाणा में मुफ्त या सस्ती बिजली माइक्रो इरिगेशन अपनाने में सबसे बड़ी बाधा है।
जब पानी और बिजली लगभग मुफ्त हों, तो किसान पानी बचाने के लिए अतिरिक्त निवेश क्यों करेंगे?
गुजरात मॉडल क्यों सफल?
गुजरात ने Gujarat Green Revolution Company के जरिए एक मजबूत संस्थागत ढांचा बनाया:
- 70–90% तक सब्सिडी
- बिजली कनेक्शन में प्राथमिकता
- बैंक लोन और बीमा सुविधा
- 5 साल तक मेंटेनेंस और तकनीकी सहायता
इससे राज्य में माइक्रो इरिगेशन का तेजी से विस्तार हुआ।
फसलों की प्रकृति भी बाधा
ड्रिप इरिगेशन हर फसल के लिए उपयुक्त नहीं है।
- धान (पैडी): खरीफ की प्रमुख फसल, लेकिन ड्रिप के लिए उपयुक्त नहीं
- गेहूं: सीमित उपयोग
इससे माइक्रो इरिगेशन का दायरा अपने आप सीमित हो जाता है।
लागत और ढांचा बड़ी चुनौती
- प्रति हेक्टेयर लागत: ₹3–4 लाख
- सब्सिडी के बाद भी किसान को ₹1 लाख तक खर्च करना पड़ता है
- छोटे और बिखरे खेतों में लागत और बढ़ जाती है
- पानी और बिजली की स्थिर उपलब्धता जरूरी
क्या केवल सब्सिडी काफी है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि समस्या सिर्फ लागत नहीं है, बल्कि नीतिगत ढांचे की है।
- पानी की कीमत तय नहीं
- सब्सिडी का डिजाइन और क्रियान्वयन कमजोर
- किसानों को तुरंत और स्पष्ट लाभ नहीं दिखता