कर्नाटक सरकार ने आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में ईवीएम की जगह बैलट पेपर प्रणाली लागू करने का प्रस्ताव रखा है। यह कदम विपक्ष के नेता राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा और ‘वोट चोरी’ के आरोपों के बाद आया है। कांग्रेस की इस पहल से बीजेपी खुलकर विरोध कर रही है और इसे राज्य और केंद्र की राजनीति में चुनौती के तौर पर देख रही है।

कांग्रेस का प्रस्ताव और कारण

कर्नाटक मंत्रिमंडल की गुरुवार की बैठक में निर्णय लिया गया कि ग्रेटर बेंगलुरु प्राधिकरण के पांच नगर निगमों सहित सभी स्थानीय निकाय चुनाव अब बैलट पेपर से कराए जाएं।

कानून और संसदीय कार्य मंत्री एच.के. पाटिल ने कहा कि लोगों की ईवीएम पर विश्वास कम हुआ है और मतदाता सूची में गड़बड़ियों की शिकायतें बढ़ी हैं। उन्होंने बताया कि मौजूदा कानूनों में संशोधन करके आवश्यक कानून पेश किए जाएंगे, जो 15 दिनों में मंत्रिमंडल के सामने आएंगे और फिर राज्यपाल के पास भेजे जाएंगे।

चुनाव आयुक्त का बयान

राज्य चुनाव आयुक्त जी.एस. संग्रेशी ने कहा कि अगर कानूनों में संशोधन होता है तो आयोग बैलेट पेपर से चुनाव कराने के लिए बाध्य होगा। उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र पहले से ही बैलट पेपर से चुनावों के लिए परिचित हैं।

संग्रेशी ने कहा, “ईवीएम की जगह मतपत्रों का इस्तेमाल कोई बड़ी चुनौती नहीं होगी। हालांकि, अगर कांग्रेस चाहती है कि बैलट पेपर से चुनाव हो, तो इसे लागू करने के लिए नई विधानसभा का चुनाव कराना पड़ेगा।”

बीजेपी का विरोध और कारण

कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा कि बैलट पेपर और ईवीएम दोनों विकल्प पहले भी कानून में थे। बीजेपी अब क्यों विरोध कर रही है, यह समझ से परे है।

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने आरोप लगाया कि कांग्रेस पुराने तरीकों से चुनाव जीतने का रास्ता खोज रही है। उन्होंने कहा कि 1990 के दशक में बैलट पेपर की पुनर्गणना के दौरान कांग्रेस की जीत हुई थी और कुछ बैलट पेपर गणना केंद्र में फेंके भी गए थे। विजयेंद्र ने स्पष्ट किया कि उनका मानना है कि चुनाव ईवीएम से ही होना चाहिए।

राजनीतिक संदेश और रणनीति

विश्लेषकों के अनुसार, कांग्रेस का यह कदम केंद्र सरकार और बीजेपी पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है। बैलट पेपर से चुनाव कराने की संभावना आने वाले समय में विपक्षी शासित राज्यों में भी लागू हो सकती है, जिससे बीजेपी के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।