विदर्भ के मीठे नींबू (संतरा प्रजाति) उगाने वाले किसान इस साल भी कठिन दौर से गुजर रहे हैं। बढ़ते तापमान, सूखे और बीमा दावों में देरी ने उनकी परेशानी को कई गुना बढ़ा दिया है। महाराष्ट्र के नागपुर ज़िले में मौसम-आधारित फसल बीमा योजना (Restructured Weather-Based Crop Insurance Scheme – RWBCIS) के तहत हजारों किसानों ने बीमा कराया, लेकिन फसल खराब होने के बाद अधिकांश को न तो भुगतान मिला, न ही किसी अस्वीकरण की वजह बताई गई।

एक किसान ने बताया, “मैंने 2023 में 50 टन मीठे नींबू की फसल के लिए ₹5,160 का बीमा प्रीमियम भरा था। ओलावृष्टि से पूरी पैदावार बर्बाद हो गई, लेकिन बीमा कंपनी ने दावा खारिज कर दिया। हमें कोई संदेश या कारण तक नहीं बताया गया।”

कृषि बीमा योजना पर सवाल

2016 में शुरू हुई RWBCIS योजना को 2025–26 तक ₹71,810 करोड़ के बजट के साथ बढ़ाया गया है। इसका उद्देश्य किसानों को मौसमजनित नुकसान से बचाना है, मगर वास्तविकता इसके उलट दिख रही है। कई किसानों का कहना है कि बीमा दावे वर्षों तक लंबित रहते हैं और भुगतान बेहद देर से मिलता है।

मीठे नींबू की ओर रुझान, लेकिन जलवायु बना दुश्मन

विदर्भ के कई किसानों ने बीते वर्षों में संतरे की जगह मीठे नींबू की खेती शुरू की थी, क्योंकि यह फसल संतरे के मुकाबले 40–50% कम पानी मांगती है और सूखे इलाकों में भी फलती है। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा मीठा नींबू उत्पादक राज्य है — जहां 2023–24 में 77,700 हेक्टेयर में 9.44 लाख टन उत्पादन हुआ।

फिर भी, मौसम की मार जारी है। 48°C तक तापमान और मात्र 705 मिमी औसत वर्षा ने फसलों को गहरा नुकसान पहुंचाया है। 2019 के सूखे में विदर्भ के करीब 60% संतरे के बागान नष्ट हो गए थे, जिससे ₹1,668 करोड़ का नुकसान हुआ था।

फूल आने का चक्र और कीट प्रकोप बढ़ा

सरकारी कृषि कॉलेज, छिंदवाड़ा के एक वैज्ञानिक ने बताया कि जलवायु परिवर्तन ने फलों के फूल आने के चक्र को बिगाड़ दिया है। “पहले हर सीजन में पेड़ फूल देते थे, अब एक सीजन में फल आता है और दूसरा पूरा फेल हो जाता है,” उन्होंने कहा।

बीमा योजना से किसानों का मोहभंग

2018 में जहां 1.15 लाख किसानों ने ₹1.25 लाख करोड़ मूल्य की फसल का बीमा कराया था, वहीं 2024 में यह संख्या घटकर 48,519 रह गई। नागपुर में तो सिर्फ 753 किसानों ने बीमा कराया और 2024 में किसी को भी दावा भुगतान नहीं हुआ।

किसानों की मांग है कि दावे तेजी और पारदर्शिता से निपटाए जाएं। “अगर 2022 का दावा 2025 में मिलेगा तो किसान अगला सीजन कैसे शुरू करेगा?” एक किसान ने सवाल उठाया।

भविष्य की चुनौती

लगातार बढ़ती गर्मी, घटती वर्षा और बीमा प्रणाली की कमजोरी ने विदर्भ के सिट्रस किसानों को असमंजस में डाल दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर नीतिगत सुधार नहीं हुए, तो आने वाले वर्षों में मीठे नींबू की खेती इस क्षेत्र में टिक नहीं पाएगी।