देश में सबसे अधिक खाद्यान्न खरीदने वाले राज्यों में से एक, मध्य प्रदेश ने विकेन्द्रीकृत खरीद प्रणाली (DCP) से बाहर निकलने के लिए केंद्र सरकार से संपर्क किया है, जिसका मुख्य कारण बढ़ती वित्तीय चुनौतियाँ हैं।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने हाल ही में केंद्र को लिखे एक पत्र में कहा है कि राज्य सरकार को DCP के तहत खरीदे गए खाद्यान्न स्टॉक की निकासी में देरी के कारण बड़ा वित्तीय नुकसान हो रहा है।

पत्र में मुख्यमंत्री ने बताया कि किसानों को भुगतान करने के लिए बैंकों से लिया गया कर्ज लगभग ₹72,177 करोड़ तक बढ़ गया है। इन सभी कारणों से, राज्य सरकार DCP प्रणाली को छोड़कर, भारतीय खाद्य निगम (FCI) द्वारा सीधी खरीद की पुरानी प्रणाली को वापस लाना चाहती है।

DCP क्यों शुरू की गई थी?

विकेन्द्रीकृत खरीद प्रणाली (DCP) को इन उद्देश्यों के साथ लागू किया गया था:
* अधिक किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का लाभ सुनिश्चित करना।
* खरीद की दक्षता बढ़ाना।
* गैर-पारंपरिक राज्यों में खरीद को प्रोत्साहित करना और पारगमन (Transit) हानि और लागत पर बचत करना।
* वितरण के लिए स्थानीय स्वाद के अधिक अनुकूल खाद्यान्न की खरीद सुनिश्चित करना।

DCP के तहत, राज्य सरकार सीधे खरीद, भंडारण और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत वितरण करती है। अतिरिक्त स्टॉक को FCI को सौंपा जाता है।

मध्य प्रदेश का महत्वपूर्ण योगदान

मध्य प्रदेश, केंद्रीय पूल में खाद्यान्न का एक प्रमुख योगदानकर्ता है:
* गेहूँ: राज्य ने DCP को 2007-08 से अपनाया, और देश के कुल केंद्रीय पूल गेहूँ खरीद में इसका योगदान लगभग 26 प्रतिशत है।
* धान: राज्य ने DCP को 1999-2000 से अपनाया, और केंद्रीय पूल धान खरीद में इसका योगदान लगभग 6 प्रतिशत है।
राज्य में गेहूँ की खरीद बढ़कर लगभग 7.8 मिलियन टन और धान की खरीद 4.4 मिलियन टन हो गई है।