खरीफ मौसम में जिले के किसानों ने 85,516 हेक्टेयर भूमि पर धान की रोपनी की है, जो कृषि विभाग द्वारा तय 88 हजार हेक्टेयर लक्ष्य का 97.2% है। विशेषज्ञों का कहना है कि सही जानकारी के अभाव में किसान कई बार उर्वरक का गलत उपयोग कर लेते हैं, जिससे फसल को नुकसान होता है या खाद व्यर्थ चली जाती है।

कृषि पदाधिकारी सह निदेशक आत्मा, आशुतोष कुमार ने किसानों को सलाह दी है कि खाद की सही मात्रा जानने के लिए मिट्टी की जांच कराकर स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। उन्होंने बताया कि धान की फसल में सामान्य तौर पर 3-4 बार उर्वरक का छिड़काव करना चाहिए।

खेत की तैयारी या रोपाई से पहले फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा डालना जरूरी है, जबकि नाइट्रोजन (यूरिया) का छिड़काव 2-3 बार रोपाई के बाद और कल्ले निकलने के समय करना चाहिए। जिंक की कमी होने पर जिंक सल्फेट या सिंगल सुपर फास्फेट का उपयोग भी करना चाहिए।

अगर जैविक खाद का उपयोग करना है, तो खेत की तैयारी के समय प्रति हेक्टेयर 5 टन गोबर की खाद डालें। इसके अलावा, रोपाई के 20-25 दिन बाद नाइट्रोजन की पहली खुराक और 30-40 दिन बाद दूसरी खुराक दें। पौधे पीले दिखने पर यूरिया और जिंक का प्रयोग विशेष रूप से जरूरी है।

विशेषज्ञों ने चेताया है कि जिंक की कमी से पौधे कमजोर हो जाते हैं और जड़ों का विकास प्रभावित होता है। ऐसे में 10 किलो जिंक सल्फेट प्रति एकड़ का छिड़काव करें। वहीं, खैरा रोग के लक्षण दिखने पर 800 ग्राम जिंक सल्फेट और 400 ग्राम बुझा चूना 180 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।