पंजाब में इस साल आई भीषण बाढ़ ने पिछले तीन दशकों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। अगस्त के आखिरी सप्ताह और सितंबर के शुरुआती दिनों में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी तेज और लगातार बारिश ने राज्य को तबाह कर दिया। सूबे के राजस्व, पुनर्वास एवं आपदा प्रबंधन मंत्री हरदीप सिंह मुंडियान के अनुसार, करीब 1.48 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि, खासकर धान की फसल, जलमग्न हो गई, जबकि 1,400 से ज्यादा गांव बाढ़ की चपेट में आ गए।
प्रभावित क्षेत्र और नुकसान
गुरदासपुर जिला सबसे ज्यादा प्रभावित रहा है, इसके बाद अमृतसर, फिरोजपुर और फाजिल्का में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। अब तक 37 लोगों की जान जा चुकी है और 3.5 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं।
पटियाला जिले में भी घग्गर नदी उफान पर आने से हरियाणा सीमा से लगे गांवों में पानी घुस गया। सरकार ने हालात को देखते हुए राज्य के सभी 23 जिलों को बाढ़ग्रस्त घोषित कर दिया है।
शहर भी डूबे
केवल ग्रामीण इलाके ही नहीं, बल्कि मोहाली, लुधियाना, जालंधर, अमृतसर और चंडीगढ़ जैसे बड़े शहरों में भी शहरी बाढ़ ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया। 1 से 3 सितंबर तक हुई मूसलाधार बारिश से सड़कों, मकानों और व्यावसायिक परिसरों में पानी भर गया। विशेषज्ञों का मानना है कि पुरानी सीवरेज और ड्रेनेज व्यवस्था इस आपदा का बड़ा कारण बनी।
स्थानीय लोगों ने संभाली मोर्चा
प्रशासनिक तंत्र के साथ-साथ गांवों के लोग भी राहत और बचाव कार्यों में आगे आए। धुस्सी बांधों पर टूटे तटबंधों को भरना, प्रभावित लोगों को धर्मशालाओं और गुरुद्वारों में ठहराना, लंगर चलाकर भोजन उपलब्ध कराना और सोशल मीडिया व गुरुद्वारों के लाउडस्पीकरों से अलर्ट जारी करना—इन सबमें ग्रामीणों की बड़ी भूमिका रही। कई पंजाबी गायक, अभिनेता और सामाजिक संगठन भी राहत कार्यों में जुटे।
बाढ़ के कारण
बाढ़ के प्राकृतिक कारणों में अत्यधिक बारिश, बादल फटना और हिमाचल प्रदेश से आए अचानक पानी का बहाव शामिल है। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, पंजाब में 30 अगस्त तक 24% ज्यादा बारिश दर्ज की गई, जबकि 28 अगस्त से 3 सितंबर के बीच देशभर में सामान्य से 48% अधिक वर्षा हुई।
मानवीय लापरवाही ने स्थिति और बिगाड़ दी।
•धुस्सी बांधों की मरम्मत और मजबूती समय पर नहीं की गई।
•नदियों के किनारे अतिक्रमण और खेती-बस्ती ने बाढ़ का असर बढ़ाया।
•नदियों और बांधों की सिल्ट नहीं हटाई गई, जिससे उनकी जलधारण क्षमता घट गई।
•नहरों व नालों के जाम होने और प्राकृतिक नालों पर अनियोजित सड़क और पुल निर्माण ने पानी के बहाव को रोक दिया।
आगे के लिए सुझाव
विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में ऐसे हालात से बचने के लिए:
1.बाढ़ क्षेत्र में अतिक्रमण रोकने और ज़ोनिंग कानून लागू करने की ज़रूरत है।
2.आईएमडी, सिंचाई विभाग और भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड के बीच बेहतर तालमेल से निगरानी व चेतावनी प्रणाली मजबूत करनी होगी।
3.बांधों-नदियों की सिल्ट सफाई और कमजोर तटबंधों की समय पर मरम्मत जरूरी है।
4.शहरी क्षेत्रों में सीवरेज व स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज सिस्टम का नवीनीकरण किया जाए।
5.नहरों और नालों की नियमित सफाई के लिए पर्याप्त फंड जारी हो।
6.प्रभावित लोगों को समय पर मुआवजा और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
7.समुदाय और सामाजिक संगठनों को आपदा प्रबंधन में भागीदार बनाया जाए।
पंजाब की 2025 की बाढ़ यह साफ संदेश देती है कि केवल प्राकृतिक कारणों को जिम्मेदार ठहराकर समस्या हल नहीं होगी। मजबूत नीतियां, सख्त अमल और समुदाय की भागीदारी ही राज्य को भविष्य की आपदाओं से बचा सकती है।