केंद्र सरकार ने देश में फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को बढ़ावा देने के लिए एक नया विचार सामने रखा है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने सुझाव दिया है कि धान (पैडी) की खेती से हटकर अन्य फसलों को अपनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाए और इसके लिए सरकार द्वारा धान पर होने वाले आर्थिक खर्च (Economic Cost) की ‘बचत’ का उपयोग किया जाए।

मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, धान की खेती पर प्रति हेक्टेयर ₹1.36 लाख का खर्च आता है। इसमें खाद्य निगम (FCI) द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद, मिलिंग, परिवहन और भंडारण की लागत भी शामिल है। वर्तमान में FCI के गोदामों में रखा धान लगभग ₹33 प्रति किलो की लागत से आता है। यदि एक हेक्टेयर पर धान की जगह वैकल्पिक फसलें उगाई जाती हैं या जमीन खाली छोड़ी जाती है, तो सरकार को ₹1.36 लाख प्रति हेक्टेयर की सीधी बचत होती है।

फसल विविधीकरण की जरूरत क्यों?

धान देश की सबसे बड़ी फसल है, जो 2024-25 में 514.23 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बोई गई है। यह फसल 614 जिलों में उगाई जाती है और बेहद जल-गहन (Water Intensive) है। धान की अधिक खेती के कारण कई राज्यों में भूजल स्तर (Groundwater Level) तेजी से गिरा है।

केंद्र सरकार का मानना है कि अब समय आ गया है कि धान की जगह दलहन (Pulses), तिलहन (Oilseeds), मक्का (Maize), मूंग (Green Gram), मूंगफली (Groundnut) और कपास (Cotton) जैसी फसलों को बढ़ावा दिया जाए। इससे न केवल प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण (Natural Resource Conservation) होगा बल्कि किसानों की आय (Farmers’ Income) बढ़ेगी और देश की पोषण सुरक्षा (Nutritional Security) भी मजबूत होगी।

भारत वर्तमान में खाद्य तेल (Edible Oils) की घरेलू मांग को पूरा करने के लिए भारी मात्रा में आयात पर निर्भर है। वैकल्पिक फसलों को अपनाकर इस निर्भरता को कम किया जा सकता है।

धान बनाम वैकल्पिक फसलें: लाभ का अंतर

कृषि मंत्रालय के अधिकारियों ने रबी सम्मेलन (Rabi Conference) की ब्रेकआउट सत्र में बताया कि MSP 2021-22 के आंकड़ों के अनुसार धान की खेती पर प्रति हेक्टेयर शुद्ध लाभ (Net Returns) ₹56,226 था, जबकि मक्का पर ₹17,856 और मूंग पर ₹45,665 ही रहा।
इस लाभ के अंतर के कारण किसान धान की बजाय अन्य फसलों को अपनाने के लिए उत्साहित नहीं होते। इसलिए सरकार को ‘प्रोत्साहन पैकेज’ (Incentives) देना होगा ताकि किसान धान से अन्य फसलों की ओर शिफ्ट हो सकें।

कहां और कैसे होगा बदलाव?

अधिकारियों ने कहा कि सबसे पहले उन जिलों पर ध्यान देना होगा जहां धान की पैदावार राष्ट्रीय औसत (लगभग 2800 किलो/हेक्टेयर) से कम है और जहां धान की खेती का क्षेत्रफल भी कम है। वहां दलहन और तिलहन को धीरे-धीरे बढ़ावा दिया जाएगा।

इसके अलावा, जिन क्षेत्रों में FCI द्वारा गेहूं और धान की खरीद अपेक्षाकृत कम होती है, वहां भी वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देने की योजना है। इन फसलों की सुनिश्चित खरीद (Assured Procurement) नेफेड (NAFED) और नेशनल कंज्यूमर्स को-ऑपरेटिव फेडरेशन (NCCF) जैसी एजेंसियों के माध्यम से की जा सकती है।

बीज, मशीनरी और समर्थन जरूरी

अधिकारियों का कहना है कि फसल विविधीकरण सफल तभी होगा जब किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज (Quality Seeds), उपयुक्त मशीनरी (Machinery for Easy Harvesting) और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद की गारंटी मिले। इसके बिना किसान जोखिम उठाने से हिचकिचाएंगे।

भोजन सुरक्षा पर असर नहीं पड़ेगा

केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि फसल विविधीकरण खाद्य सुरक्षा (Food Security) से समझौता किए बिना किया जाएगा। इसका मतलब यह है कि जहां जरूरत होगी वहां धान की खेती जारी रहेगी, लेकिन कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में धीरे-धीरे वैकल्पिक फसलों को अपनाया जाएगा।

निष्कर्ष

धान की जगह अन्य फसलों को बढ़ावा देने की यह रणनीति दीर्घकालिक लाभ (Long-Term Benefits) देने वाली हो सकती है। इससे जहां सरकार को प्रति हेक्टेयर ₹1.36 लाख की बचत होगी, वहीं किसानों को अधिक विकल्प और नई फसलें अपनाने का मौका मिलेगा। साथ ही, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और खाद्य तेल जैसी वस्तुओं पर आयात निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।