केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वह अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री और भाजपा नेता पेमा खांडू पर लगे भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोपों की जांच नहीं कर सकती।
सरकार ने यह जवाब एक जनहित याचिका (PIL) पर दाखिल अपने हलफनामे में दिया, जिसमें दो गैर-सरकारी संगठनों — सेव मॉन रीजन फाउंडेशन और वॉलंटरी अरुणाचल सेना — ने मुख्यमंत्री खांडू पर सरकारी ठेके अपने परिवार के सदस्यों को देने के आरोप लगाते हुए जांच की मांग की थी।
केंद्र ने कहा – राज्य के अधिकार क्षेत्र का मामला
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि मंत्रियों के आचरण संहिता (Code of Conduct for Ministers) के तहत आने वाले मामले राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, और वित्त मंत्रालय के सार्वजनिक खरीद संबंधी नियम (Public Procurement Rules) राज्यों पर बाध्यकारी नहीं हैं।
सरकार ने कहा, “गृह मंत्रालय की 18 सितंबर 2025 की अधिसूचना के अनुसार, आचरण संहिता की धारा 2(d) केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के मंत्रियों पर लागू होती है, लेकिन इसके बाद गृह मंत्रालय की भूमिका समाप्त हो जाती है।”
क्या कहती है आचरण संहिता?
आचरण संहिता के अनुसार —
“मंत्री को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके परिवार के सदस्य उस सरकार को वस्तुएं या सेवाएं आपूर्ति करने वाले व्यवसाय में शामिल न हों, या ऐसे व्यवसायों में भागीदार न बनें जो सरकार से लाइसेंस, परमिट, कोटा, पट्टे आदि पर निर्भर हों।”
हालांकि, केंद्र सरकार ने कहा कि इस नियम के अनुपालन की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है, और गृह मंत्रालय (MHA) की इसमें कोई और भूमिका नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने क्या कहा
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण और नेहा राठी ने तर्क दिया कि मुख्यमंत्री खांडू ने न केवल गृह मंत्रालय की आचरण संहिता का उल्लंघन किया, बल्कि वित्त मंत्रालय के खरीद नियमों की भी अवहेलना की।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जिन ठेकों की बात की जा रही है, उनमें टेंडर प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी मार्च में सुनवाई के दौरान यही सवाल उठाया था —
“अगर टेंडर नहीं बुलाए गए, तो प्रक्रिया क्या थी? इसका स्पष्ट उत्तर दिया जाना चाहिए।”
राज्य सरकार का जवाब
अरुणाचल प्रदेश सरकार ने जुलाई में अपना जवाब दाखिल करते हुए सभी आरोपों को निराधार बताया।
सरकार ने कहा कि खांडू या उनके परिवार के किसी सदस्य को कोई सरकारी ठेका सीधे तौर पर नहीं दिया गया। लगभग 95% ठेके खुले टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से दिए गए, जिनमें तकनीकी और वित्तीय निविदाओं का परीक्षण किया गया।
राज्य सरकार ने कहा कि किसी भी व्यक्ति या संस्था को “पसंद-नापसंद के आधार पर ठेका देने या अनुचित लाभ पहुंचाने” जैसी कोई बात नहीं हुई।