खरीफ सीजन में तेलंगाना के किसानों पर मंडरा रहे यूरिया संकट पर कंसोर्टियम ऑफ इंडियन फार्मर्स एसोसिएशन्स (CIFA) के मुख्य सलाहकार पी. चेंगल रेड्डी ने केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि खराब योजना, समन्वय की कमी और रासायनिक खादों पर अत्यधिक निर्भरता ने किसानों की उत्पादकता और मनोबल दोनों को बुरी तरह प्रभावित किया है।
रेड्डी ने Telangana Today से बातचीत में चेतावनी दी कि राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त आवंटन होने के बावजूद आपूर्ति की कमी कृषि उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।
उन्होंने कहा—
“किसानों को लापरवाह यूरिया उपयोग के चलते कगार पर धकेल दिया गया है और यह संकट उसी का परिणाम है। भारत में रासायनिक खादों पर निर्भरता के बावजूद उत्पादकता में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ, जबकि अमेरिका, ब्राज़ील और चीन जैसे देशों ने बायोटेक खेती से क्रांति ला दी है।”
आपूर्ति में बाधाएं
रेड्डी ने बताया कि राष्ट्रीय स्तर पर 183 लाख मीट्रिक टन यूरिया आपूर्ति हुई, जबकि मांग 143 लाख मीट्रिक टन थी, इसके बावजूद तेलंगाना में कमी बनी रही।
इसकी बड़ी वजह रामागुंडम फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड (RFCL) का 78 दिन तक बंद रहना और चीन की निर्यात पाबंदियों से उत्पन्न वैश्विक आपूर्ति संकट रहा।
उन्होंने कहा—
“कारण चाहे जो हों, आपूर्ति मांग के अनुसार नहीं हो रही है। इस संकट का समाधान सिर्फ सरकार के हाथ में है।”
बायोटेक खेती की वकालत
रेड्डी ने कहा कि कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए भारत को अब जैव प्रौद्योगिकी (Biotech) और जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलों को अपनाना होगा।
उन्होंने बताया कि अमेरिका, ब्राज़ील और चीन जैसे देशों ने Bt (कीट-रोधी) और हर्बिसाइड टॉलरेंट फसलों को अपनाकर उत्पादन, आय और वैश्विक खाद्य सुरक्षा में भारी सुधार किया है।
भारत में अधिक यूरिया उपयोग से उत्पादन ठप हो गया है। इसका बड़ा उदाहरण कपास है—जहां पहले भारत हर साल 70 लाख गांठें निर्यात करता था, अब 2024-25 में 3 मिलियन गांठें आयात करनी पड़ रही हैं। इस साल उत्पादन में 10% की गिरावट के साथ 29.53 मिलियन गांठें ही अनुमानित हैं। आयात 107% बढ़कर 1.2 बिलियन डॉलर पहुंच गया है, जबकि घरेलू उत्पादकता 447 किलो प्रति हेक्टेयर है, जो चीन (1,993 किलो) से बहुत पीछे है।
समाधान और विकल्प
रेड्डी ने किसानों से अपील की कि वे समझदारी से उत्पादन घटाकर दाम बढ़ाने की रणनीति अपनाएं और IFFCO के नैनो यूरिया जैसे टिकाऊ विकल्पों पर विचार करें।
उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की सिंचाई परियोजनाओं की सराहना की, जिनमें कालेश्वरम लिफ्ट इरिगेशन प्रोजेक्ट और पलमुरु-रंगारेड्डी योजना प्रमुख हैं। इन पहलों से 2014 के बाद से तेलंगाना का सिंचित क्षेत्र दोगुना हो गया है और राज्य को “धान का कटोरा” बना दिया है।