सोमवार की उमस भरी शाम को एमजीआर चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर तिरुपुर से लौटते प्रवासी मजदूरों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। हाथ में बैग, ट्रॉली और बिस्तर लपेटे ये मजदूर गंगा-कावेरी एक्सप्रेस से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड लौट रहे थे।

तिरुपुर के होजरी एक्सपोर्ट हब पर अमेरिकी बाजार में 50 प्रतिशत टैरिफ ने गहरा असर डाला है। ऑर्डर घटने, इन्वेंट्री बढ़ने और फैक्ट्री मालिकों के पास मजदूरों को वेतन देने की क्षमता खत्म होने के चलते, दिवाली से करीब एक माह पहले ही प्रवासी मजदूरों की नौकरियां जा रही हैं। उद्योग के अनुमान के मुताबिक, लगभग आधे प्रवासी मजदूरों ने अपनी नौकरी खो दी है।

“पहले हफ्ते में छह दिन काम मिलता था, अब मुश्किल से दो दिन,” समस्तीपुर (बिहार) के मजदूर कुलदीप कहते हैं। “किराया और खाने का खर्च कमाई से ज्यादा है, इसलिए फिलहाल घर लौट जाना ही बेहतर है।”

तिरुपुर की यह स्थिति कोविड-19 संकट की याद दिला रही है। हालांकि इस बार मजदूरों के पास घर लौटने के लिए सार्वजनिक परिवहन और थोड़ी बचत है।

उद्योग में गिरावट और बंद होती फैक्ट्रियां

तिरुपुर, जो भारत के कुल कॉटन निटवियर एक्सपोर्ट का 90 प्रतिशत और कुल निटवियर एक्सपोर्ट का 55 प्रतिशत आपूर्ति करता है, अमेरिकी बाजार पर सबसे ज्यादा निर्भर है। 2024-25 में तिरुपुर से कुल 39,618 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ, जिसमें 30-35 प्रतिशत अमेरिकी बाजार में गया।

तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (TEA) के संस्थापक ए. साक्षीवेल के अनुसार, 2,500 एक्सपोर्ट निटवियर यूनिट्स में से 20 प्रतिशत बंद हो चुकी हैं और आधी ने उत्पादन कम कर दिया है।

करीब 50 प्रतिशत यूनिट्स ने अपने कर्मचारियों की संख्या आधी कर दी है। कई एक्सपोर्टर्स को अमेरिकी ग्राहकों को सप्लाई न कर पाने के कारण अतिरिक्त यूनिट्स बंद करनी पड़ी हैं।

“हमारे ऑर्डर 40 प्रतिशत तक गिर गए हैं। अमेरिकी ग्राहकों ने लगभग ऑर्डर देना बंद कर दिया है,” करुमाथामपट्टी (तिरुपुर) के एक मध्यम स्तर के उद्योगपति एस. कृष्णमूर्ति कहते हैं।

मजदूरों पर संकट की मार

तिरुपुर के 5 लाख मजदूरों में से आधे से ज्यादा प्रवासी हैं – मुख्यत: बिहार, झारखंड, ओडिशा और उत्तर प्रदेश से। ये सिलाई, आयरनिंग और पैकिंग जैसे काम करते हैं, जबकि स्थानीय लोग सुपरवाइजरी भूमिकाओं में रहते हैं।

“जब ऑर्डर रुकते हैं, तो सबसे पहले प्रवासी मजदूरों को ही झटका लगता है,” सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU) के जिला महासचिव जी. संपथ कहते हैं।

बिहार के धिलीपकुमार बताते हैं, “मैंने सोचा था कि बेटी को तिरुपुर में इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाऊंगा, अब गांव लौटकर सरकारी स्कूल में पढ़ाना पड़ेगा।”

यूपी के विक्रम सिंह कहते हैं, “मैंने बाइक खरीदने और घर पैसे भेजने के लिए 50,000 रुपये का कर्ज लिया। अब नहीं पता वह कैसे चुकाऊं।”

झारखंड के दर्जी पठान कुमार कहते हैं, “हम यहां सपने लेकर आए थे, लेकिन सब टूट गया। मालिकों के पास ऑर्डर नहीं हैं, हम क्या करें?”

नए काम की तलाश

कुछ युवा मजदूर चेन्नई और कोयंबटूर जैसे शहरों में कंस्ट्रक्शन या पेंटिंग जैसे काम कर रहे हैं। लेकिन मजदूरी और हालात संतोषजनक नहीं हैं। यूपी के 27 वर्षीय अतीफ कहते हैं, “तिरुपुर में 700–900 रुपये मिल जाते थे, अब पेंटिंग में कम मिलता है। लगता है गांव लौट जाना ही बेहतर है।”

मजदूरों के पास बचत नहीं होती, वे किराये के कमरों में रहते हैं और हर हफ्ते बिना काम के उनका कर्ज बढ़ता है। यही कारण है कि अब ट्रेनें प्रवासी मजदूरों से खचाखच भरी हैं, जो अपने गांव लौट रहे हैं।

उद्योगपतियों के मुताबिक, वे मशीनें चलाए रखने के लिए छोटे ऑर्डर ले रहे हैं, लेकिन हर बिके बिना बचा पीस एक बोझ बन रहा है।

बांग्लादेश और वियतनाम को फायदा

विशेषज्ञों का मानना है कि कम टैरिफ वाले देशों – बांग्लादेश और वियतनाम – को अब तिरुपुर के कॉन्ट्रैक्ट मिल सकते हैं। यह संकट सिर्फ उद्योग नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की आजीविका को भी प्रभावित कर रहा है।