कृषि पर जलवायु परिवर्तन के असर को लेकर सदन में पूछे गए एक पश्न के उत्तर में आज, ग्रामीण विकास और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लोकसभा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) अध्ययन का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि आईसीएआर ने मिट्टी के क्षरण, वर्षा पैटर्न प्रक्षेपण और फसल की पैदावार पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का आकलन करने के लिए सिमुलेशन मॉडलिंग अध्ययन किया है।

बारिश में होने वाली इस वृद्धि के चलते 2050 तक फसल भूमि से 10 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष की मिट्टी का नुकसान होगा। वहीं अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से लवणता प्रभावित क्षेत्र भी 2030 तक 6.7 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 11 मिलियन हेक्टेयर होने का अनुमान है।

सदन में उठे एक अन्य सवाल के लिखित जवाब में आज, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा और बिजली राज्य मंत्री श्रीपद येसो नाइक ने राज्यसभा में बताया कि पिछले कुछ सालों में देश में सौर ऊर्जा उत्पादन उपकरणों, यानी सौर पीवी मॉड्यूल की लागत में काफी कमी आई है। वर्तमान में यह 15-25 रुपये प्रति वाट की रेंज में है, जो इसे अन्य जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा स्रोतों की तुलना में ऊर्जा का एक सस्ता स्रोत बनाता है।

देश में स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता भी तेजी से बढ़ रही है। साल 2023-24 के दौरान, लगभग 15 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित की गई, जबकि वर्ष 2024-25 के दौरान, 31 जनवरी, 2025 तक लगभग 18.5 गीगावाट पहले ही स्थापित की जा चुकी है।

असम में बांस की खेती को लेकर सदन में उठे एक सवाल के जवाब में, कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने लोकसभा में कहा कि पुनर्गठित राष्ट्रीय बांस मिशन (एनबीएम) के तहत, गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री जुटाने के लिए 2018-19 से असम में 10 बांस की नर्सरी स्थापित की गई।

इसके माध्यम से पौधे उत्पादन क्षमता बढ़कर 2.5 लाख प्रति वर्ष हो गई है। तब से राज्य में 1856 हेक्टेयर क्षेत्र को बांस की खेती के अंतर्गत लाया गया है। इसके अलावा, दर्ज वनों में असम का कुल बांस-असर वाला क्षेत्र 2021 में 10,659 वर्ग किमी से बढ़कर 2023 में 11246 वर्ग किमी हो गया है।