चमगादड़ धरती के वो जीव हैं जो काफी बड़े हिस्से में फैले हुए हैं। खुशगवार मौसम और पर्याप्त भोजन की तलाश में इनमें से कई हजारों किलोमीटर का सफर तय करते हैं।
वैज्ञानिकों को अब तक चमगादड़ों के प्रवास के बारे में कम ही जानकारी थी। एक नई कोशिश के तहत इन चमगादड़ों में छोटे ट्रांसमीटर और कम ताकतवर सेंसरों के नेटवर्क की मदद से इनके प्रवास पर नई जानकारी जुटाई गई है। एक साइंस जर्नल में इस बारे में एक रिसर्च रिपोर्ट छपी है।
रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक अनुकूल हवा का फायदा उठा कर चमगादड़ यूरोप में 1,000 किलोमीटर से ज्यादा की यात्रा कर आते हैं। चूहे के बराबर आकार वाले ये छोटे चमगादड़ बच्चे पालने के लिए उचित जगह की तलाश में यह यात्रा करते हैं। इन्हें सामान्य रूप से नॉक्टुला (निकेटैलस नॉक्टुला) कहा जाता है. इनकी यात्रा का समय मौसम के हिसाब से तय होता है।
चमगादड़ों के बारे में इस खोज से उन्हें पवन चक्कियों की चपेट में आने से बचाने में मदद मिल सकती है. छोटे जीवों के प्रवास के बारे में पता लगाना कठिन होता है। जीवविज्ञानी लंबे समय से चमगादड़ों के प्रवास के बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहे थे। चमगादड़ों में पारंपरिक टैग लगाने से रिसर्चरों को बस यही पता लग पा रहा था कि उन्होंने यात्रा की शुरुआत कहां की और उसे खत्म कहां किया। इसके अतिरिक्त ड्रोन और वेदर रडार के इस्तेमाल से भी चमगादड़ों के उड़ने के रास्ते का कुछ पता चला।
फ्रांस के नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के संरक्षण जीवविज्ञानी शाहलोत रोएमर और उनके सहयोगियों ने 30 देशों में चमगादड़ों पर काम करने वाले 60 संरक्षकों के जमा किए अल्ट्रासोनिक रिकॉर्डिंग को भी जमा किया ताकि चमगादड़ों के प्रवास के रास्ते का पता चल सके। हालांकि इनमें से कोई भी तरीका पूरे रास्ते के बारे में जानकारी नहीं दे सका। ऐसे में माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल बिहेवियर ने एक सेंसर विकसित किया है।
एक ग्राम वजनी इस सेंसर को आसानी से नॉक्टुला चमगादड़ों में लगाया जा सकता है, और वो इसे साथ लेकर आसानी से उड़ान भर सकते हैं। अस्थायी सर्जिकल ग्लू के सहारे यह उनके बदन से चिपका दिया जाता है। ये सेंसर दो हफ्ते तक उनके शरीर पर रहते हैं और उनकी गति के साथ ही तापमान को भी रिकॉर्ड करते हैं। पूरे दिन में 1,440 बार आंकड़े दर्ज करके उन्हें भेजना यही सेंसरों का काम है।
वैज्ञानिकों ने पहले इन आंकड़ों को एक एंटिना का इस्तेमाल कर अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के जरिये हासिल करने की योजना बनाई थी। हालांकि रूस-यूक्रेन संघर्ष ने उस सहयोग का रास्ता बंद कर दिया। तब माक्स प्लांक इंस्टिट्यूट के बिहेवियरल इकोलॉजिस्ट एडवर्ड हुर्मे और उनके सहयोगियों ने कंप्यूटर, स्मार्टफोन और दूसरे उपकरणों का एक व्यापक नेटवर्क बनाया और इसके जरिए हर दिन आने वाले आंकड़ों तक पहुंच बनाई। सेंसर नेटवर्क में मौजूद पास के उपकरणों तक मिनट दर मिनट जानकारी भेजते रहे।
रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने हर रात करीब 383 किलोमीटर तक की यात्रा की और उनकी गति 13 से 43 मीटर प्रति सेकेंड थी। सेंसर अक्सर पूरे वक्त काम नहीं कर सके लेकिन वो इतनी देर तक जरूर चलते रहे कि चमगादड़ों की मंजिल की जानकारी मिल सके। रोएमर के मुताबिक उन्होंने इस बात के भी सबूत दिए कि सारे चमगादड़ एक दिशा में प्रवास नहीं करते।
हुर्मे और उनकी टीम ने इसमें मौसम के आंकड़ों को भी जोड़ कर देखा. इसमें हवा की गति और दिशा, हवा का दबाव, बादल, बारिश और हवा का तापमान सबको आंकड़ों के विश्लेषण में शामिल किया. हुर्मे का कहना है कि इसके नतीजे में, “हमने उन पर्यावरणीय स्थितियों को समझना शुरू किया” जो चमगादड़ों को उनके वसंत प्रवास के लिए प्रेरित करती हैं। प्रजनन के बाद चमगादड़ स्विट्जरलैंड लौट कर शीतनिद्रा में चले जाते हैं।