पिछले साल जब उत्तर भारत में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया था, तब दिल्ली के पास रहने वाले डेयरी किसान नीरज भारद्वाज की एक गाय ने समय से कई महीने पहले बछड़े को जन्म दिया। नवजात बछड़ा बहुत छोटा था और उसके शरीर पर लगभग बाल नहीं थे। लोगों को लगा कि वह जीवित नहीं बचेगा, लेकिन नीरज ने बोतल से दूध पिलाकर उसकी देखभाल की, जिसके बाद धीरे-धीरे उसकी हालत सुधरी।
वैज्ञानिकों का कहना है कि समय से पहले बछड़ों का जन्म अब बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तन का असर है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है और दुनिया के कुल दूध उत्पादन का लगभग एक चौथाई हिस्सा भारत से आता है। यहां ज्यादातर दूध छोटे किसानों द्वारा पैदा किया जाता है, जिनके पास केवल 2 से 5 पशु होते हैं।
डेयरी सेक्टर भारत की जीडीपी में करीब 5% योगदान देता है और 8 करोड़ से अधिक किसानों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है। लेकिन लगातार बढ़ती गर्मी अब इस सेक्टर के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार अत्यधिक गर्मी में गाय और भैंस कम चारा खाती हैं, कम दूध देती हैं और गर्भधारण में भी दिक्कत होती है। कई बार गर्भपात की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं। इतना ही नहीं, दूध में फैट की मात्रा भी कम हो जाती है, जिससे किसानों की आमदनी घटती है।
नीरज भारद्वाज का कहना है कि तेज गर्मी के दौरान दूध उत्पादन में करीब 30% तक गिरावट आ जाती है। साथ ही पशुओं को ठंडा रखने के लिए बिजली, पानी और विशेष चारे पर खर्च भी काफी बढ़ जाता है।
भारत में दूध उत्पादन पिछले कई वर्षों में लगातार बढ़ा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2023-24 में देश का दूध उत्पादन रिकॉर्ड 239 मिलियन टन तक पहुंच गया। लेकिन अब वैज्ञानिकों और डेयरी विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती गर्मी इस मॉडल की कमजोरियों को उजागर कर रही है।
राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) के वैज्ञानिकों के अनुसार अधिक दूध देने वाली विदेशी और क्रॉसब्रीड गायें गर्मी से ज्यादा प्रभावित होती हैं। उनके शरीर में पहले से अधिक गर्मी बनती है, इसलिए वे जल्दी तनाव में आ जाती हैं।
गर्मी से बचाने के लिए किसानों को शेड में पंखे, वेंटिलेशन और तिरपाल जैसी व्यवस्थाएं करनी पड़ रही हैं। नीरज भारद्वाज ने अपने पशु शेड को गर्मी से बचाने के लिए लगभग 2 लाख रुपये खर्च किए।
विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े डेयरी व्यवसाय तो नई तकनीक और कूलिंग सिस्टम अपना रहे हैं, लेकिन छोटे किसानों के लिए इतना निवेश करना आसान नहीं है। आने वाले समय में छोटे स्तर पर डेयरी चलाना और मुश्किल हो सकता है।
वैज्ञानिक अब ऐसी नस्लों पर काम कर रहे हैं जो ज्यादा गर्मी सह सकें। कई किसान अब देसी नस्लों जैसे थारपारकर को बेहतर मान रहे हैं क्योंकि ये गर्म मौसम में ज्यादा टिकाऊ होती हैं और कम बीमार पड़ती हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल देसी नस्लों से समस्या हल नहीं होगी। भविष्य में दूध की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए बेहतर नस्ल, आधुनिक शेड, संतुलित चारा और पशु स्वास्थ्य पर एक साथ काम करना होगा।
बार-बार पड़ रही हीटवेव के कारण अब बीमा कंपनियां भी पशुओं के लिए गर्मी से जुड़ी बीमा योजनाएं ला रही हैं। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल बीमा काफी नहीं है, किसानों को बदलते मौसम के अनुसार खुद को भी तैयार करना होगा।
नीरज भारद्वाज कहते हैं, “भारत दूध उत्पादन में दुनिया का नेता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन का असर भी हम पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है।”