पंजाब में हालिया बाढ़ ने सिर्फ खेतों को जलमग्न नहीं किया, बल्कि मिट्टी की प्रकृति भी बदल दी है। हिमालय की तराई से आई लाल रेत और गाद बड़ी मात्रा में पंजाब की ज़मीन पर जम गई है। इससे मिट्टी की उर्वरता, पोषण संतुलन और भविष्य की फसलों पर सवाल खड़े हो गए हैं।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के कुलपति डॉ. सतबीर सिंह गोसल ने कहा कि यह बदलाव हानिकारक भी हो सकता है और लाभकारी भी।
उन्होंने बताया, “लाल पहाड़ी मिट्टी खनिजों से भरपूर है और पहाड़ी क्षेत्रों में फसलों को सहारा देती है। यदि इसे सही ढंग से पंजाब की मिट्टी के साथ मिलाया जाए, तो फायदा हो सकता है। लेकिन इसके लिए गहन परीक्षण ज़रूरी है।”
इसी कड़ी में पीएयू व्यापक मिट्टी परीक्षण अभियान शुरू करने जा रहा है, जिसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश के स्तर की जांच की जाएगी, ताकि उत्पादन क्षमता बहाल की जा सके।
डॉ. गोसल ने कहा, “अगर हम सही तरीके से मिट्टी का प्रबंधन करें और तुरंत कार्रवाई करें तो इस चुनौती को अवसर में बदला जा सकता है। पहाड़ी मिट्टी सब्ज़ियों और अन्य फसलों के लिए उपयोगी है — बस हमें समझना होगा कि इसे कैसे अपनाना है।”
हालांकि समस्या यहीं तक सीमित नहीं है। मौजूदा खरीफ फसलें बर्बाद हो गई हैं और रबी सीजन (गेहूं व चना) पर भी संकट मंडरा रहा है। खेतों में पानी भरा हुआ है और किसानों के बीज भंडार नष्ट हो गए हैं।
राज्य में 2.7 लाख हेक्टेयर भूमि पर फसलें नष्ट हो चुकी हैं और सबसे प्रभावित जिला गुरदासपुर है। धान, मक्का, तिलहन और दलहन 4–5 फीट पानी में डूब गईं, गन्ने की फसल गिर गई और ज्वार-बाजरा जैसी चारे की फसलें मोटी गाद के नीचे दब गईं। इससे पशुओं के चारे का भी गंभीर संकट पैदा हो गया है।
डॉ. गोसल ने चेतावनी दी कि बची हुई फसलों पर अब बीमारियों, कीट और पोषण की कमी का खतरा मंडरा रहा है। इस स्थिति से निपटने के लिए पीएयू ने फसल आकस्मिक योजना लागू की है और विशेषज्ञों के संपर्क नंबर सोशल मीडिया पर जारी किए हैं।
इसके साथ ही विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान केंद्र (KVKs) प्रभावित गांवों में सर्वे करेंगे और जिन किसानों के बीज नष्ट हो गए हैं, उन्हें नाममात्र कीमत पर गेहूं का बीज उपलब्ध कराएंगे।
डॉ. गोसल ने कहा, “यह सिर्फ एक सीज़न का नुकसान नहीं है, बल्कि पूरी कृषि चक्र में व्यवधान है।”